श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.4.46 
না খায, না লয কারো, না করে সম্ভাষ
সবে নিরবধি এক কীর্তন-বিলাস”
ना खाय, ना लय कारो, ना करे सम्भाष
सबे निरवधि एक कीर्तन-विलास”
 
 
अनुवाद
"वह न तो खाते हैं, न दान लेते हैं, न ही दूसरों से बात करते हैं। उनका एकमात्र काम हमेशा कीर्तन का आनंद लेना है।"
 
"He neither eats, nor accepts donations, nor talks to others. His only work is always to enjoy kirtan."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)