श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 432
 
 
श्लोक  3.4.432 
নিরন্তর পডাযেন গীতা-ভাগবত
ভক্তি বাখানেন মাত্র—গ্রন্থের যে মত
निरन्तर पडायेन गीता-भागवत
भक्ति वाखानेन मात्र—ग्रन्थेर ये मत
 
 
अनुवाद
वे निरंतर भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् की शिक्षा देते थे। उन्होंने सिखाया कि भक्ति ही इन दोनों साहित्यों का सार है।
 
He continuously taught Bhagavad Gita and Srimad Bhagavatam. He taught that devotion is the essence of both these literatures.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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