श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 404
 
 
श्लोक  3.4.404 
নিরবধি দেহে রোম-হর্ষ, অশ্রু, কম্প
হুঙ্কার, গর্জন, মহা-হাস্য, স্তম্ভ, ঘর্ম
निरवधि देहे रोम-हर्ष, अश्रु, कम्प
हुङ्कार, गर्जन, महा-हास्य, स्तम्भ, घर्म
 
 
अनुवाद
उनका शरीर हमेशा रोंगटे खड़े होने, आंसू बहने, कंपकंपी, दहाड़ने, गरजने, हंसने, स्तब्ध होने और पसीने से सजा रहता था।
 
His body was always adorned with goosebumps, tears, tremors, roars, howls, laughter, stupor and sweat.
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