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श्लोक 3.4.380  |
কাঙ্টা ফুটে যেই মুখে, সে-ই মুখে যায
পাযে কাঙ্টা ফুটিলে কি স্কন্ধে বাহিরায? |
काङ्टा फुटे येइ मुखे, से-इ मुखे याय
पाये काङ्टा फुटिले कि स्कन्धे बाहिराय? |
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| अनुवाद |
| "जब काँटा शरीर में घुसता है, तो उसे उसी जगह से निकलना होता है। अगर पैर में काँटा चुभ जाए, तो क्या उसे कंधे से निकाला जा सकता है?" |
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| "When a thorn enters the body, it has to come out from the same place. If a thorn pricks the leg, can it be removed from the shoulder?" |
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