श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 380
 
 
श्लोक  3.4.380 
কাঙ্টা ফুটে যেই মুখে, সে-ই মুখে যায
পাযে কাঙ্টা ফুটিলে কি স্কন্ধে বাহিরায?
काङ्टा फुटे येइ मुखे, से-इ मुखे याय
पाये काङ्टा फुटिले कि स्कन्धे बाहिराय?
 
 
अनुवाद
"जब काँटा शरीर में घुसता है, तो उसे उसी जगह से निकलना होता है। अगर पैर में काँटा चुभ जाए, तो क्या उसे कंधे से निकाला जा सकता है?"
 
"When a thorn enters the body, it has to come out from the same place. If a thorn pricks the leg, can it be removed from the shoulder?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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