श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 369
 
 
श्लोक  3.4.369 
“কিছু না জানিলুঙ্ মুঞি আপনাঽ খাইযা
বৈষ্ণবের নিন্দা কৈলুঙ্ প্রমত্ত হৈযা
“किछु ना जानिलुङ् मुञि आपनाऽ खाइया
वैष्णवेर निन्दा कैलुङ् प्रमत्त हैया
 
 
अनुवाद
"मुझे कुछ भी नहीं पता था। पागलपन में मैंने एक वैष्णव की निंदा करके अपना सर्वनाश कर लिया।"
 
"I knew nothing. In my madness I ruined myself by slandering a Vaishnava."
तात्पर्य
कुष्ठरोगी बोला, 'पागलपन में मैंने वैष्णव की महिमा को न समझते हुए उनकी निंदा की है। अपने अपराध का दंड तो मैंने भुगत लिया है। परंतु मेरे अपराध का प्रायश्चित आप ही जानते हैं।' उत्तर में भगवान ने कहा, 'यह साधारण दुख तो तुम्हें शुरू में ही मिला है। वैष्णव की निंदा करने वालों को यमराज असीम आगे दुख देते हैं। अड़ोयासी हज़ार प्रकार का दंड यमराज देते हैं। अपराध तभी मिटता है, जब अपराध करने वाले को जिस पर अपराध हुआ हो, वह उसे माफ़ कर दे, जैसे दूसरे काँटे की मदद से जहाँ काँटा चुभा है, वहाँ से उसे निकाला जाता है।'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)