श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 345
 
 
श्लोक  3.4.345 
এই মত কৌতুকে আছেন গৌর-সিṁহ
চতুর্-দিকে শোভে সব চরণের ভৃঙ্গ
एइ मत कौतुके आछेन गौर-सिꣳह
चतुर्-दिके शोभे सब चरणेर भृङ्ग
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सिंहरूपी गौर अपने सेवकों से घिरे हुए उनकी लीलाओं का आनन्द लेते थे, जो भगवान के चरणकमलों पर भौंरों के समान थे।
 
Thus Gaura in the form of a lion enjoyed His pastimes surrounded by His attendants, who were like bees at the Lord's lotus feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)