श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 287
 
 
श्लोक  3.4.287 
কি রন্ধন—ইহা তঽ কহিলে কিছু নয
এ অন্নের গন্ধে ও কৃষ্ণেতে ভক্তি হয
कि रन्धन—इहा तऽ कहिले किछु नय
ए अन्नेर गन्धे ओ कृष्णेते भक्ति हय
 
 
अनुवाद
"मैं ऐसे पाक-कला का वर्णन करने में असमर्थ हूँ। इस चावल को सूंघने मात्र से ही कृष्ण भक्ति उत्पन्न हो जाती है।"
 
"I am unable to describe such culinary art. Just smelling this rice generates devotion for Krishna."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)