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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन
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श्लोक 25
श्लोक
3.4.25
নিরবধি করযে ভূতের সঙ্কীর্তন
না জানি তাঙ্হার স্থানে মিলে কত জন
निरवधि करये भूतेर सङ्कीर्तन
ना जानि ताङ्हार स्थाने मिले कत जन
अनुवाद
"वह संन्यासी किसी भयंकर संकीर्तन में लगा है। मुझे नहीं पता कि कितने लोग उसके साथ शामिल हुए हैं।"
"That monk is engaged in some fierce chanting. I don't know how many people have joined him."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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