श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  3.4.232 
কদাচিত আইর যে কিছু বাহ্য হয
সেই বিষ্ণু-পূজা লাগিঽ—জানিহ নিশ্চয
कदाचित आइर ये किछु बाह्य हय
सेइ विष्णु-पूजा लागिऽ—जानिह निश्चय
 
 
अनुवाद
यह निश्चित जान लो कि माता शची कभी-कभी जो भी बाह्य चेतना प्रदर्शित करती थीं, वह केवल विष्णु की पूजा के उद्देश्य से ही होती थी।
 
Know this for certain that whatever external consciousness Mother Shachi sometimes displayed was only for the purpose of worshipping Vishnu.
तात्पर्य
श्री गौर से विरह में श्री शचीमाता अपना पूरा दिन कृष्ण की लीलाओं में लीन होकर बिताया करती थीं। श्री यशोदा के दिव्य कृत्य श्री शची का हृदय हर लिया करते थे। माता शची यदि कभी बाह्य चेतना का परिचय भी देती थीं तो वह केवल परमेश्र्वर की आराधना के अभिप्राय से ही होता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)