श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन  »  श्लोक 223
 
 
श्लोक  3.4.223 
অবিচ্ছিন্ন ধারা দুই নযনেতে ঝরে
সে কাকু শুনিযা কাষ্ঠ পাষাণ বিদরে
अविच्छिन्न धारा दुइ नयनेते झरे
से काकु शुनिया काष्ठ पाषाण विदरे
 
 
अनुवाद
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसके करुण क्रंदन की आवाज़ से लकड़ी और पत्थर भी पिघल रहे थे।
 
Tears flowed from his eyes incessantly, and the sound of his pitiful cries melted even the wood and stone.
तात्पर्य
शब्द काकू का अर्थ है "दयनीय शब्द" या "रुकी हुई आवाज़।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)