vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
»
अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन
»
श्लोक 210
श्लोक
3.4.210
প্রাণ-নাথ গৃহে পাইঽ আচার্য গোসাঞি
না জানে আনন্দে আছেন কোন্ ঠাঞি
प्राण-नाथ गृहे पाइऽ आचार्य गोसाञि
ना जाने आनन्दे आछेन कोन् ठाञि
अनुवाद
अपने जीवन के प्रभु को अपने घर में पाकर आचार्य गोसांई इतने आनंद में थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वे कहां हैं।
Acharya Goswami was so happy to have the Lord of his life in his home that he did not even know where he was.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×