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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 4: श्री अच्युतानंद की लीलाओं का वर्णन और श्री माधवेन्द्र का पूजन
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श्लोक 146
श्लोक
3.4.146
মনে মনে চিন্তেন অদ্বৈত মহাশয
“ব্যবহার, পরমার্থ—দুই পক্ষ হয
मने मने चिन्तेन अद्वैत महाशय
“व्यवहार, परमार्थ—दुइ पक्ष हय
अनुवाद
अद्वैत महाशय ने सोचा, “दो रिश्ते हैं - सांसारिक और आध्यात्मिक।
Advaita Mahasaya thought, “There are two relationships – worldly and spiritual.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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