श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 471
 
 
श्लोक  3.2.471 
প্রভুর আনন্দ-মূর্চ্ছা হৈল যে-মতে
বাহ্য নাহি ভিলেক, আছেন সেই মতে
प्रभुर आनन्द-मूर्च्छा हैल ये-मते
बाह्य नाहि भिलेक, आछेन सेइ मते
 
 
अनुवाद
भगवान परमानंद में अचेत रहे। उनमें बाह्य चेतना का लेशमात्र भी आभास नहीं हुआ।
 
The Lord remained unconscious in ecstasy. He did not have even the slightest trace of external consciousness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)