श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 3: अंत्य-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान के भुवनेश्वर और अन्य स्थानों से जगन्नाथ पुरी तक के यात्रा का वर्णन,  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.2.44 
ক্রোধ করিঽ বলে,—“মুঞি না খাইমু ভাতঽ
দিব্য করিঽ রহে নিজ শিরে দিযে হাত
क्रोध करिऽ बले,—“मुञि ना खाइमु भातऽ
दिव्य करिऽ रहे निज शिरे दिये हात
 
 
अनुवाद
“गुस्से में वह कह सकता है, ‘मैं आज खाना नहीं खाऊँगा।’ वह अपने सिर पर हाथ रखकर कसम भी खा सकता है।
 
“In anger, he may say, ‘I will not eat today.’ He may even swear with his hands on his head.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)