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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 10: श्री पुण्डरीक विद्यानिधि की महिमा
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श्लोक 54
श्लोक
3.10.54
একেশ্বর দামোদর-স্বরূপ-সṁহতি
প্রভু সে আনন্দে পডে, না জানেন কতি
एकेश्वर दामोदर-स्वरूप-सꣳहति
प्रभु से आनन्दे पडे, ना जानेन कति
अनुवाद
भगवान दामोदर स्वरूप की संगति में ऐसे आनंदित होते थे कि उन्हें पता ही नहीं चलता था कि वे कहाँ हैं।
The Lord was so delighted in the company of Damodara Swarupa that he did not know where he was.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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