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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 3: अंत्य-खण्ड
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अध्याय 10: श्री पुण्डरीक विद्यानिधि की महिमा
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श्लोक 133
श्लोक
3.10.133
তবে কেনে রহিযাছ জাতি-নাশা-স্থানে
জাতি রাখি’ চল তুমি আপন-ভবনে
तबे केने रहियाछ जाति-नाशा-स्थाने
जाति राखि’ चल तुमि आपन-भवने
अनुवाद
"तो फिर तुम ऐसी जगह क्यों रह रहे हो जहाँ तुम्हारी जाति चली जाएगी? अगर तुम अपनी जाति बचाना चाहते हो, तो बेहतर होगा कि तुम घर चले जाओ।"
"Then why are you staying in a place where your race will be destroyed? If you want to save your race, you'd better go home."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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