श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.9.57 
জয জয ক্ষীর-সিন্ধু-মধ্যে গোপবাসীজয
জয ভক্ত-হেতু প্রকট বিলাসী
जय जय क्षीर-सिन्धु-मध्ये गोपवासीजय
जय भक्त-हेतु प्रकट विलासी
 
 
अनुवाद
"क्षीरसागर में निवास करने वाले ग्वालबाल की जय हो! भक्तों के लिए लीला करने वाले प्रभु की जय हो!
 
"Hail the cowherd boy who resides in the ocean of milk! Hail the Lord who performs divine play for his devotees!
तात्पर्य
व्रजेंद्र-नंदन, जो हर चीज़ के मूल स्रोत हैं, जो स्थानीय परमात्मा हैं जिन्हें क्षीरोंदकशायी विष्णु के रूप में जाना जाता है, और जो गोपाल समुदाय के सदस्य हैं, निश्चित रूप से गौराहरी के रूप में प्रकट हुए हैं। अपनी स्वयं की सेवा प्रकट करने की इच्छा से, उन्होंने भक्तों के लिए अपनी गौरा लीलाएं प्रकट कीं। [गोपवासी] के लिए एक अन्य पढ़ाई गुप्तवासी है, या "वह जो गुप्त रूप से निवास करता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)