श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.9.56 
জয জয পতিত-পাবন গুণ-সিন্ধু
জয জয পরম শরণ দীন-বন্ধু
जय जय पतित-पावन गुण-सिन्धु
जय जय परम शरण दीन-बन्धु
 
 
अनुवाद
"दिव्य गुणों के आगार और पतित आत्माओं के उद्धारक की जय हो! परम आश्रय और दीन-दुखियों के मित्र की जय हो!
 
"Hail to the repository of divine virtues and the redeemer of fallen souls! Hail to the ultimate refuge and friend of the poor and the distressed!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)