श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.9.55 
জয জয বেদ-ধর্ম সাধু-জন-ত্রাণ
জয জয আব্রহ্ম-স্তম্বের মূল-প্রাণ
जय जय वेद-धर्म साधु-जन-त्राण
जय जय आब्रह्म-स्तम्बेर मूल-प्राण
 
 
अनुवाद
"वैदिक सिद्धांतों के रक्षक और साधु पुरुषों की जय हो! ब्रह्मा से लेकर जड़ जीवों तक, सभी को जीवन देने वाले भगवान की जय हो!
 
"Victory to the protectors of Vedic principles and saintly men! Victory to the Lord who gives life to all, from Brahma to the inanimate beings!
तात्पर्य
प्रभु, जो साधु-सज्जनों के उद्धारक हैं और पवित्र नामों के उच्चारण के रूप में वैदिक धार्मिक सिद्धांतों के संस्थापक हैं, अपार महिमा के पात्र हैं। अधर्मी वैदिक सिद्धांतों के विपरीत नास्तिक धार्मिक सिद्धांतों का पालन करते हैं। श्री गौराहारी, जो ब्रह्मा से लेकर निर्जीव प्राणियों तक, दृश्यमान संसार में सभी जीवित संस्थाओं का मूल जीवन हैं, अपार महिमा के पात्र हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)