श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.9.35 
নাম-মাত্র অষ্টোত্তর-শত ঘট জল
সহস্র ঘটে ও অন্ত না পাই সকল
नाम-मात्र अष्टोत्तर-शत घट जल
सहस्र घटे ओ अन्त ना पाइ सकल
 
 
अनुवाद
औपचारिकता के तौर पर वहां एक सौ आठ घड़े पानी रखने थे, लेकिन हजारों घड़ों में भी इतना पानी नहीं आ सकता था।
 
As a formality, one hundred and eight pots of water were to be kept there, but even thousands of pots could not hold that much water.
तात्पर्य
साधारणतः शुभ कर्मकाण्ड में एक सौ आठ की संख्या महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, पर यहाँ तो उससे भी सैंकड़ों गुनी थी। प्रभु स्नान की विधि हरिभक्ति-विलास (19.88) में यों बतायी गयी है- 'अपनी सामर्थ्यनुसार सहस्र, पॉंच सौ, ढाई सौ आठ, चौंसठ, बत्तीस, सोलह अथवा चार जल कलशों से प्रभु का स्नान करना चाहिए- स्वर्ण, चाँदी, तांबा, पीतल या मिट्टी के पात्रों से।'।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)