श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.9.30 
অদ্বৈত-শ্রীবাস-আদি যতেক প্রধান
পডিযা পুরুষ-সূক্ত করাযেন স্নান
अद्वैत-श्रीवास-आदि यतेक प्रधान
पडिया पुरुष-सूक्त करायेन स्नान
 
 
अनुवाद
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तात्पर्य
ॐ सहस्र-शीर्ष पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र-पात

स भूमिं विश्वतो वृत्तिति अतिष्ठद दशंगुलम्

परम भगवान के सार्वभौमिक रूप में एक हजार सिर, एक हजार आंखें और एक हजार पैर हैं, क्योंकि उनमें सभी जीव समाहित हैं। ब्रह्मांड को अस्तित्व देने के लिए उसे पूरी तरह से व्याप्त करके और स्वतंत्र होकर, उन्होंने स्वयं को ब्रह्मांड से दस अंगुल आगे बढ़ा दिया।

ॐ पुरुष एवदं सर्वं यद् भूतं यच च भव्यम्

उतामृततत्वस्येशानो यद् अन्नेनातिरोहति

ब्रह्मांड-अतीत, वर्तमान और भविष्य-परम भगवान के पुरुष विस्तार की अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि वह अमरता के भगवान हैं, उन्होंने स्वयं को ब्रह्मांड में पुरुष के रूप में प्रकट किया है ताकि जीव भौतिक फलों का आनंद ले सकें।

ॐ एतवाँ अस्य महिमा अतो ज्यायंश च पुरुषः

पदोऽस्य विश्वभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि

अतीत, वर्तमान और भविष्य के ब्रह्मांड भगवान की शक्तियों की अभिव्यक्तियाँ हैं, लेकिन भगवान स्वयं बहुत बड़े हैं। ब्रह्माण्ड के सभी प्राणी एक-चौथाई भाग मात्र हैं, और आध्यात्मिक आकाश में शाश्वत प्रकृति तीन-चौथाई भाग में विद्यमान है।

ॐ त्रिपाद ऊर्ध्व उदैत पुरुषः पदो अशयेहा

भवात् पुनात्ततो विश्वं व्यक्रमात शासनेन अभि:

भगवान का तीन-चौथाई भाग भौतिक भाग से परे है। भगवान ने एक-चौथाई भाग में ब्रह्माण्ड को फिर से प्रकट किया, जैसा कि उन्होंने पहले भी बार-बार किया था। एक चौथाई भाग के स्वामी ने चारों ओर घूमकर, सभी चेतन और निर्जीव वस्तुओं का रूप धारण करके सृष्टि का कार्य प्रारंभ किया।

ॐ तस्माद् विरद अजायत विराजो अधि पुरुष:

जातो अतयारिच्यता पाश्चद् भूमिम् अथो पुरः

भगवान से, ब्रह्मांड का जन्म हुआ, और उस ब्रह्मांड में विराट-पुरुष, ब्रह्मांड के परमात्मा का जन्म हुआ। फिर विराट-पुरुष बड़े हुए और उन्होंने पृथ्वी तथा जीवों के शरीरों को उत्पन्न किया।

ॐ तस्माद् यज्ञात् सर्व-हुतः संभृतम् पुष्द-आज्यम्

पशुं तं चक्रे वायव्यान् अरण्यं ग्राम्यश्च ये

उस यज्ञ से जहां ब्रह्मांड में सब कुछ बलिदान किया गया था, दही और घी - और वास्तव में, सभी पौष्टिक खाद्य पदार्थ - उत्पन्न हुए थे। इसने हवा, जंगल और गाँव के जानवरों का निर्माण किया।

ॐ तस्माद् यज्ञात् सर्व-हुता ऋचाः समानि जज्निरे

छंदसि जज्निरे तस्माद यजुस तस्माद अजायत

उस परम बलिदान, या सर्व-हुता से, सात वैदिक छंदों के साथ वेदों के ऋक [भजन], साम [संगीत] और यजुस् [गद्य] भागों का जन्म हुआ।

ॐ तस्माद् अश्व अजयंता ये के कोभायदतः

गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज जाता अजवायः

बलिदान से घोड़ों का जन्म हुआ, साथ ही गधे और खच्चर जैसे दो दांतों वाले जानवर भी पैदा हुए। बलि से बकरियों और भेड़ों के साथ-साथ गायें भी उत्पन्न हुईं।

ॐ तं यज्ञं बर्हिषि पौक्षणं पुरुषं जातम

अग्रतःतेन देवा अयजंता साध्ययर्षयश्च ये

देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने ब्रह्मांड के प्रथम प्राणी विराट-पुरुष को कुश घास पर रखा और शुद्धिकरण के लिए उन पर पानी छिड़का। इस प्रकार उन्होंने विराट-पुरुष का उपयोग करके मानसिक यज्ञ का आयोजन किया।

ॐ यत् पुरुषं व्यादधुः कतिधा व्याकल्पयन

मुखं किम अस्य कौ बहु काव उरु पद उच्यते

मानसिक यज्ञ में, जब उन्होंने विराट-पुरुष को विभाजित किया, तो उन्होंने कितने भागों में विभाजित किया? उसके चेहरे, भुजाओं, जाँघों और पैरों के बारे में क्या कहा गया है?

ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखं आसीद् बहु राजन्यः

कृताहुरु तद् अस्य यद वैश्यः पद्भ्यांशुद्रो अजायत

ब्राह्मण [विराट-पुरुष के] चेहरे से, क्षत्रिय उनकी दोनों भुजाओं से, वैश्य उनकी जांघों से, और शूद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए।

ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्च चक्षोः सूर्यो अजायत

मुखाद इन्द्रश्च चग्निश च प्रणाद वायुर अजायत

उसके मन ने चंद्रमा को जन्म दिया; उसकी दो आँखें, सूरज; उसकी सांस, वायु; और उसका मुख, इंद्र और अग्नि।

ॐ नाभ्य आसीद अंतरिक्षशीर्षो द्यौः समावर्तत

पद्भ्यां भूमिर दिशाश्रोत्रात् तथा लोकान् अकल्पयन

उनकी नाभि से पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का स्थान उत्पन्न हुआ; उसके सिर से, स्वर्ग; उसके चरणों से, पृथ्वी; और उसके कानों से, दिशाएँ। इस प्रकार संसारों की रचना हुई।

ॐ यत् पुरुषेण हविषा देव यज्ञं अतन्वत

वसंतो 'स्यासिद् अज्यं ग्रीष्म इध्मशरद धाविः'

देवता, प्रथम प्रकट प्राणी, ने सृष्टि को पूरा करने के लिए एक मानसिक यज्ञ किया। इस बलिदान के लिए उन्होंने प्रसाद के रूप में विराट-पुरुष [भौतिक संसार की कच्ची सामग्री] का उपयोग किया। वसंत घी है, ग्रीष्म ईंधन लकड़ी है, और शरद ऋतु प्रसाद है।

ॐ सप्तस्यासं परिधायः त्रिः सप्त समिधाः

कृतःदेव यद् यज्ञं तन्वना अबाध्नां पुरुषं पशुम्

इस यज्ञ में अग्नि के चारों ओर बिखरे हुए कुश घास के तिनके [राक्षस से सुरक्षा के लिए] सात थे [सात वैदिक काव्य मीटर], और ईंधन की छड़ें इक्कीस थीं [बारह महीने, पांच मौसम, तीन लोक और सूर्य] . मानसिक यज्ञ करने वाले देवताओं ने विराट-पुरुष को बलि पशु के रूप में अर्पित करने के लिए बाँध दिया।

ओम यज्ञेन यज्ञं अयजंता देवास

तानि धर्माणि प्रथमानि आसन

ते हा नाकं महीमानः सचन्ते

यत्र पूर्वे साध्यः शांति देवः

इस प्रकार देवताओं ने विश्व में विविधता प्रकट करने के लिए विराट-पुरुष का उपयोग करके मानसिक यज्ञ का आयोजन किया। उस बलिदान से प्रकृति के भौतिक नियम और आचरण की पहली आध्यात्मिक संहिता दोनों उत्पन्न हुईं। समान मानसिक पूजा से महान आत्माएं अमरता का स्थान प्राप्त करती हैं जहां साध्य और देवता, प्रथम पूजक निवास करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)