यो हि भागवतं लोकमुपहासं नृपोत्तम
करोति तस्य नश्यंति अर्थ-धर्म-यशः-सुताः
निंदां कुर्वंति ये मूढा वैष्णवानां महात्मनां
पतंति पितृभि: साधार्धं महा-रौरव-संज्ञिते
हंति निंदति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनंदति
क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने पतनानि षट
"हे प्रिय राजन! यदि कोई किसी श्रेष्ठ भक्त का उपहास करता है, तो वह अपने धार्मिक कार्यों, अपने वैभव, अपनी प्रतिष्ठा और अपने पुत्रों को खो देता है। वैष्णव सभी महान आत्माएँ हैं। जो कोई भी उनकी निंदा करता है, वह महारौरव नामक नरक में गिर जाता है। उसके साथ उसके पितृ भी हैं। जो कोई भी किसी वैष्णव की हत्या करता है या उसकी निंदा करता है, जो कोई भी वैष्णव से ईर्ष्या करता है या उससे क्रोधित होता है और जो कोई भी वैष्णव को प्रणाम नहीं करता है या उसे देखकर खुशी महसूस नहीं करता है, वह निश्चित रूप से नारकीय स्थिति में गिर जाता है।"
