श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  2.9.237 
দেখিঽ মূর্খ দরিদ্র যে সুজনেরে হাসে
কুম্ভিপাকে যায সেই নিজ-কর্ম-দোষে
देखिऽ मूर्ख दरिद्र ये सुजनेरे हासे
कुम्भिपाके याय सेइ निज-कर्म-दोषे
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति किसी गरीब, अशिक्षित साधु पुरुष का उपहास करता है, वह अपने कर्मों के फलस्वरूप कुम्भीपाक नामक नरक में जाता है।
 
A person who mocks a poor, uneducated saintly person goes to the hell called Kumbhipak as a result of his actions.
तात्पर्य
हिंदी-टेक्स्ट: जो पागलपन से अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं, वे वैष्णव में सांसारिक वैभव और सांसारिक शिक्षा की कमी देखते हैं और उनकी निंदा करने का दुस्साहस करते हैं, अपने कार्यों के परिणामस्वरूप कुम्भीपाक नामक नरक में यातना दी जाती है। स्कंदपुराण में, मार्कंडेय भगीरथ से इस प्रकार कहते हैं:

यो हि भागवतं लोकमुपहासं नृपोत्तम

करोति तस्य नश्यंति अर्थ-धर्म-यशः-सुताः

निंदां कुर्वंति ये मूढा वैष्णवानां महात्मनां

पतंति पितृभि: साधार्धं महा-रौरव-संज्ञिते

हंति निंदति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनंदति

क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने पतनानि षट

"हे प्रिय राजन! यदि कोई किसी श्रेष्ठ भक्त का उपहास करता है, तो वह अपने धार्मिक कार्यों, अपने वैभव, अपनी प्रतिष्ठा और अपने पुत्रों को खो देता है। वैष्णव सभी महान आत्माएँ हैं। जो कोई भी उनकी निंदा करता है, वह महारौरव नामक नरक में गिर जाता है। उसके साथ उसके पितृ भी हैं। जो कोई भी किसी वैष्णव की हत्या करता है या उसकी निंदा करता है, जो कोई भी वैष्णव से ईर्ष्या करता है या उससे क्रोधित होता है और जो कोई भी वैष्णव को प्रणाम नहीं करता है या उसे देखकर खुशी महसूस नहीं करता है, वह निश्चित रूप से नारकीय स्थिति में गिर जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)