श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 234
 
 
श्लोक  2.9.234 
কি করিবে বিদ্যা, ধন, রূপ, যশ, কুলে
অহঙ্কার বাডি, সব পডযে নির্মূলে
कि करिबे विद्या, धन, रूप, यश, कुले
अहङ्कार बाडि, सब पडये निर्मूले
 
 
अनुवाद
शिक्षा, धन, सौंदर्य, यश और उच्च कुल का क्या मूल्य है? ये तो केवल अहंकार बढ़ाते हैं और पतन का कारण बनते हैं।
 
What value do education, wealth, beauty, fame, and high lineage have? They only increase ego and lead to downfall.
तात्पर्य
साधारण गरीब सोचते हैं कि शिक्षा, धन-संपदा, सुंदरता, यश, और पारिवारिक प्रतिष्ठा ही जीवन के लक्ष्य हैं। श्रीमद् भागवतम् (1.8.26) में कहा गया है:

जनमैश्वर्य-श्रुत-श्रीभिर

एधमान-मदः पुमान

नैवारहत्यभिधातुं वै

त्वामकिंचन-गोचरम्

"हे मेरे प्रभु, आपकी कृपा आसानी से प्राप्त की जा सकती है, पर केवल उन लोगों द्वारा जो भौतिक सुखों से थक चुके हैं। जो भौतिक प्रगति के मार्ग पर है, जो खुद को सम्माननीय वंशावली, महान धन-संपदा, उच्च शिक्षा और शारीरिक सुंदरता से सुधारने की कोशिश कर रहा है, वह ईमानदारी से आप तक नहीं पहुँच सकता।" इस कथन को न समझने के कारण, जो लोग भौतिक उन्नति की लालसा रखते हैं, वे गलती से शिक्षा, धन-संपदा, सुंदरता, यश और अच्छे परिवार की चाहत रखते हैं। इसलिए भगवान चैतन्य की सेवा के लिए अलौकिक लालसा उनके दुर्भाग्य में कोई स्थान नहीं पाती। (श्रीमद् भागवतम् 10.10.8 और 10.73.10 और कठ उपनिषद 1.2.6 देखें।)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)