जनमैश्वर्य-श्रुत-श्रीभिर
एधमान-मदः पुमान
नैवारहत्यभिधातुं वै
त्वामकिंचन-गोचरम्
"हे मेरे प्रभु, आपकी कृपा आसानी से प्राप्त की जा सकती है, पर केवल उन लोगों द्वारा जो भौतिक सुखों से थक चुके हैं। जो भौतिक प्रगति के मार्ग पर है, जो खुद को सम्माननीय वंशावली, महान धन-संपदा, उच्च शिक्षा और शारीरिक सुंदरता से सुधारने की कोशिश कर रहा है, वह ईमानदारी से आप तक नहीं पहुँच सकता।" इस कथन को न समझने के कारण, जो लोग भौतिक उन्नति की लालसा रखते हैं, वे गलती से शिक्षा, धन-संपदा, सुंदरता, यश और अच्छे परिवार की चाहत रखते हैं। इसलिए भगवान चैतन्य की सेवा के लिए अलौकिक लालसा उनके दुर्भाग्य में कोई स्थान नहीं पाती। (श्रीमद् भागवतम् 10.10.8 और 10.73.10 और कठ उपनिषद 1.2.6 देखें।)
