"इसीलिए तुम्हारा मन मुझसे विचलित नहीं होता। इसलिए मैं तुम्हें वेदों से गोपनीय भक्ति प्रदान कर रहा हूँ।"
"That is why your mind is not distracted by me. Therefore I am giving you secret devotion from the Vedas."
तात्पर्य
वेद-गोप्य भक्ति-योग शब्दावली को इस प्रकार समझाया गया है: अपनी ही इन्द्रियतृप्ति के अनुरूप, सांसारिक ज्ञान का अभिमान रखने वाले भौतिकवादी, अज्ञा-रुढि यानी अविवेकी व्यक्तियों के अनुसार शब्दों के पारंपरिक अर्थ के द्वारा वैदिक मंत्रों की व्याख्या करते हैं। विद्वत-रुढि यानी प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार शब्दों के पारंपरिक अर्थ की शरण लेने के कारण, वैदिक साहित्य अयोग्य व्यक्तियों की दृष्टि को आच्छादित कर देता है। केवल वे ही लोग जो कि अत्यंत भाग्यशाली है, वेदों के अपने अध्ययन से यह समझ सकते हैं कि सर्वोच्च आराध्य प्रभु ही हरि है, हरि के लिए भक्तिपूर्ण सेवा उन्हें प्राप्त करने का तरीका है, और हरि का प्रेम ही जीवन का चरम लक्ष्य है। साधारण मूर्ख लोग वैदिक साहित्य में केवल कर्मकांड के सिद्धांतों को देखते हैं। अन्य लोग, जो पूजा की वस्तु, पूजने वाले और मायावादी दर्शन की शरण में पूजा में विविधता को नकारते हुए अविभाजित निराकारवाद के दर्शन को गर्व से स्थापित करते हैं, भक्ति सेवा को प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं। मूर्त रूप में वेद उन लोगों के हृदय में भक्ति सेवा को जगाते हैं जिन पर प्रभु का अनुग्रह होता है। भक्ति सेवा प्राप्त करना जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्तं वरान् निबोधत - "जागो! उठो! इस मानवीय जीवन के रूप में अपने पास मौजूद महान आशीर्वाद को समझो। अब इसका उपयोग करो और प्रकृति के भौतिक गुणों के चंगुल से मुक्त हो जाओ।" कठोपनिषद (1.3.14) के इस कथन के महत्व को यहाँ स्थापित किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद (5.6) में कहा गया है: तद् वेद-गुह्योपनिषत्सु गुढम् - "वह परम निरपेक्ष सत्य उपनिषदों में अस्पष्ट रूप से वर्णित है, जो कि वेदों के गोपनीय भाग हैं।" प्रेम-भक्ति-चंद्रिका में कहा गया है: वेद-विधि-अगोचर, रतन-वेदीर पर - "उस दिव्य युगल की निरंतर पूजा करो, जो एक जवाहरात से जड़े हुए सिंहासन पर विराजमान हैं और जो वैदिक आज्ञाओं की पहुंच से परे हैं।" (भगवद-गीता 18.64-66 और श्रीमद् भागवतम 2.2.34 पर चर्चा करनी चाहिए)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥