श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 213
 
 
श्लोक  2.9.213 
ভক্তি-যোগে তোমারে বেচিল সত্যভামা
ভক্তি-বশে তুমি কান্ধে কৈলে গোপ-রামা
भक्ति-योगे तोमारे वेचिल सत्यभामा
भक्ति-वशे तुमि कान्धे कैले गोप-रामा
 
 
अनुवाद
"भक्ति के कारण ही सत्यभामा ने आपको बेचा था। भक्ति के वशीभूत होकर आपने व्रज की एक गोपिका को अपने कंधों पर उठा लिया था।"
 
"It was because of devotion that Satyabhama sold you. Driven by devotion, you lifted a gopika from Vraja on your shoulders."
तात्पर्य
सत्यभामा की भक्ति भावना के बारे में इस प्रकार बताया गया है: कृष्ण के द्वारका में रहने के दौरान, महान ऋषि नारद एक दिन कृष्ण के सामने इंद्र द्वारा दिए गए पारिजात के फूल के साथ आये। उस समय कृष्ण रुक्मिणी के घर में निवास कर रहे थे। जब नारद ने वह पारिजात फूल श्रीकृष्ण को भेंट किया, तो भगवान वासुदेव ने उसे रुक्मिणी को दे दिया। यह देखकर, नारद ने रुक्मिणी के सौभाग्य की प्रशंसा की और निष्कर्ष निकाला कि वह कृष्ण की सबसे अंतरंग और पवित्र पत्नी थीं। तत्पश्चात, उस समय उपस्थित सत्यभामा की दासीयों ने सत्यभामा को इस घटना के बारे में सूचित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब सत्यभामा गर्व से भर गईं, तो कृष्ण उनके निवास स्थान पर गए और सत्यभामा को प्रसन्न करने के लिए उनके घर में एक संपूर्ण पारिजात पेड़ लाने का वादा किया। तत्पश्चात, जब नारद वहां गए और विशेष रूप से पुण्यक-व्रत की महिमा की, तो सत्यभामा ने उस व्रत का पालन करने की इच्छा व्यक्त की। फिर कृष्ण इंद्र के निवास अमरावती से पारिजात पेड़ लाए, और उस व्रत के नियमों के अनुसार, सत्यभामा ने कृष्ण को उस पारिजात पेड़ से बांध दिया और उन्हें दान में नारद को दे दिया। (हरिवंश, विष्णु-पर्व, अध्याय सत्तर-छह)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)