श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 185
 
 
श्लोक  2.9.185 
ভক্তের পদার্থ প্রভু হেন মতে খায
কোটি হৈলে ও অভক্তের উলটিঽ না চায
भक्तेर पदार्थ प्रभु हेन मते खाय
कोटि हैले ओ अभक्तेर उलटिऽ ना चाय
 
 
अनुवाद
इस प्रकार भगवान अपने भक्तों के दान का आनंद लेते हैं और अभक्तों द्वारा दिए गए लाखों दानों पर दृष्टि नहीं डालते।
 
Thus the Lord enjoys the donations of His devotees and does not look at the millions of donations given by non-devotees.
तात्पर्य
चूँकि श्रीधर महाप्रभु के भक्त थे, महाप्रभु उनसे सस्ते भाव में चीज़ें ज़बरदस्ती खरीदते थे और इस प्रकार श्रीधर की सेवा स्वीकार करते थे। लेकिन अगर कोई अमीर अधर्मी चीज़ें भेंट करता है, तो वह नज़र भरकर भी नहीं देखते। (इस सन्दर्भ में भगवद्गीता 9.26 और श्रीमद्भागवत 7.9.11 पर चर्चा करनी चाहिए।)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)