श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 147-148
 
 
श्लोक  2.9.147-148 
যতেক পাষণ্ডী বলে,—“শ্রীধরের ডাকে
রাত্রে নিদ্রা নাহি যাই, দুই কর্ণ ফাটে
মহাচাষা-বেটা ভাতে পেট নাহি ভরে
ক্ষুধায ব্যাকুল হঞা রাত্রি জাগিঽ মরে”
यतेक पाषण्डी बले,—“श्रीधरेर डाके
रात्रे निद्रा नाहि याइ, दुइ कर्ण फाटे
महाचाषा-बेटा भाते पेट नाहि भरे
क्षुधाय व्याकुल हञा रात्रि जागिऽ मरे”
 
 
अनुवाद
सभी नास्तिकों ने शिकायत की, "श्रीधर के ज़ोर-ज़ोर से रोने के कारण हम रात को सो नहीं पाते और हमारे कान फट गए हैं। वह एक नीच जाति का आदमी है, जिसका पेट नहीं भरता। भूख से व्याकुल होकर वह सारी रात जागता रहता है।"
 
All the atheists complained, "We cannot sleep at night because of Sridhar's loud cries, and our ears are torn. He is a low-caste man who never gets enough food. Tormented by hunger, he stays awake all night."
तात्पर्य
पवित्र नामों के जाप का वास्तविक अर्थ न समझते हुए, नास्तिकों ने कहा, "चूँकि गरीब श्रीधर अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ है, वह अपने भोजन और कपड़े खरीदने में असमर्थ है। क्योंकि उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वह पूरी रात जोर-जोर से चिल्लाता है ताकि सर्वोच्च भगवान को परेशान किया जा सके और आम लोगों की शांति भंग की जा सके। यद्यपि इस तरह के कुकर्म श्रीधर जैसे अत्यधिक असभ्य व्यक्ति के लिए उपयुक्त हैं, लेकिन हम पूरी रात ऐसे कीर्तन को स्वीकार नहीं कर सकते।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)