यस्यहं अनुगृह्णामि हरिष्ये तद-धनंशनैः
“यदि मैं किसी का विशेष रूप से अनुग्रह करता हूँ, तो मैं धीरे-धीरे उसे उसके धन से वंचित कर देता हूँ।”
ब्रह्मणं यम अनुगृह्नामि
तद-विशो विधुनोम्य अहं
यन-मदः पुरुषः स्थब्धो
लोकं माँ चावमन्यते
“प्रिय भगवान ब्रह्मा, भौतिक संपन्नता के कारण एक मूर्ख व्यक्ति बुद्धिहीन और पागल हो जाता है। इस प्रकार, उसके पास तीनों लोकों में किसी के लिए भी कोई सम्मान नहीं होता है और वह मेरे अधिकार को भी धता बताता है। ऐसे व्यक्ति का मैं यह особый अनुग्रह कर के पहले उसकी सारी संपत्ति छीन लेता हूँ।”
