श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 9: भगवान का इक्कीस घंटे का भावोन्माद और श्रीधर और अन्य भक्तों के लक्षणों का वर्णन  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.9.132 
ভক্ত অঙ্গে অঙ্গ দিযা পাদ-পদ্ম মেলিঽ
লীলায আছেন গৌর-সিṁহ কুতুহলী
भक्त अङ्गे अङ्ग दिया पाद-पद्म मेलिऽ
लीलाय आछेन गौर-सिꣳह कुतुहली
 
 
अनुवाद
सिंहरूपी गौर ने अपने चरण फैलाकर तथा भक्तों के शरीर को स्पर्श करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी लीलाओं का आनन्द लिया।
 
Gaura in the form of a lion stretched out his legs and touched the bodies of the devotees and happily enjoyed their pastimes.
तात्पर्य
इस अभूतपूर्व अद्भुत क्रीड़ा में तन्मय होकर भी सिंह नन्दन गौरा ने भक्तभाव को अपने हृदय में छुपाया। ये उनकी लीलाएँ हैं। यह कोई बाध्य कर्मो के फलों का भोग जैसा नहीं है.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)