किसी दिन भगवान उद्धव या अक्रूर की भाव-भंगिमा स्वीकार करते थे, और किसी दिन बलराम की भाव-भंगिमा में मग्न होकर मदिरा मांगते थे।
On some days the Lord would accept the expressions of Uddhava or Akrura, and on other days, being engrossed in the expressions of Balarama, he would ask for liquor.
तात्पर्य
कभी-कभी अक्रूर के व्यवहार से क्षुब्ध होकर प्रभु गोपियों के भाव में मग्न हो जाते थे। कभी उन्हें उद्धव की सांत्वना के वचनों से शांति मिलती थी और अगले पल वे विरह के अधिरूढ़-महाभाव का प्रदर्शन करते थे। कभी वह अपने आपको रोहिणी का पुत्र समझकर मदिरा पीने की इच्छा व्यक्त करते। कोई भी यह भ्रम न करे कि उन्होंने भक्तों को अंतःशाक्तो बहिःशैवः सभायां वैष्णवो मतः का दर्शन सिखाया- "आंतरिक रूप से शाक्त, बाह्य रूप से शैव और सभा में वैष्णव होना।" यह बताने के लिए कि भगवान विष्णु के विविध लीला स्वयं उनकी मधुर इच्छा से होती हैं और जीव जो भगवान के अभिन्न अंग हैं, उनके नित्य सेवक हैं, श्री कृष्णचंद्र ने अपने श्री गौर-लीला में जो कुछ भी प्रदर्शित किया, वह केवल आश्रय और आश्रित के बीच अंतर का प्रदर्शन है। इसीलिए श्री रूप के अनुयायियों ने खासकर सभी को चेताया है कि परम भगवान को आश्रित पृथक भागों में से एक न समझें। चूँकि श्री रूपानुगो के विरोधी साहित्यकार भौतिक गतिविधियों को निष्पादित करने में व्यस्त हैं, वे गौर के अधीनता से विचलित होकर श्री गौर के अंतरंग सहयोगियों के शत्रु बन जाते हैं। इस तरह के अशुभता को दूर करने के लिए, श्री चैतन्यदेव ने अपने लीलाओं में विभिन्न विरोधाभासी भाव प्रदर्शित किए हैं। एक आचार्य के रूप में, भगवान ने परिचारित और परिचारक दोनों के लीलाओं को उचित रूप से प्रदर्शित किया ताकि सशर्त आत्माओं को खुद को या अन्य पृथक भागों को चंद्रमा को छूने की कोशिश करने वाले एक बौने की तरह सर्वोच्च भगवान के अवतार की कल्पना करने से रोका जा सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥