श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.8.66 
আপনার বধু দেখে পুত্রের হৃদযে
সকৃত্ দেখিযা আর দেকিতে না পাযে
आपनार वधु देखे पुत्रेर हृदये
सकृत् देखिया आर देकिते ना पाये
 
 
अनुवाद
उसने अपनी बहू को अपने बेटे की छाती पर देखा। फिर अचानक सारा दृश्य गायब हो गया।
 
He saw his daughter-in-law on his son's chest. Then suddenly the whole scene disappeared.
तात्पर्य
श्री सत्यदेवी ने दो नंगे पाँच साल के लड़के देखे। एक के सीने को कौस्तुभ मणि से सजाया गया था, और दूसरे ने हल और मुसल अपने हाथों में पकड़े हुए थे। दोनों लड़कों की चार भुजाएं थीं। उनकी पुत्रवधू, विष्णुप्रिया-देवी, एक लड़के के सीने पर मौजूद थी। उसने इस दृश्य को कुछ पल के लिए देखा और फिर उसे दोबारा नहीं देख सकी।

इस पद की पहली पंक्ति इंगित करती है कि उसने श्री लक्ष्मीदेवी को श्री कृष्ण के सीने पर देखा। पद्म पुराण में कहा गया है: "श्री कृष्ण की सुंदरता को देखने के बाद, श्री लक्ष्मीदेवी उनके प्रति आकर्षित हो गई और उन्होंने तपस्या करना शुरू कर दिया। फिर भगवान कृष्ण ने उनसे पूछा, 'तुम किस कारण से तपस्या कर रही हो?' लक्ष्मी ने उत्तर दिया, 'मैं एक गोपी का रूप लेना चाहती हूं और वृंदावन में आपके साथ रहना चाहती हूं।' भगवान कृष्ण ने कहा, 'वह बहुत ही कम प्राप्त होता है।' लक्ष्मी ने फिर कहा, 'हे मेरे प्रभु, मैं आपके सीने पर सुनहरी रेखाओं के रूप में रहना चाहती हूं।' भगवान कृष्ण ने तब कहा, 'ऐसा ही हो।'" तब से लक्ष्मी सुनहरी रेखाओं के रूप में भगवान कृष्ण के सीने पर ही रहीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)