श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.8.6 
নিত্যানন্দ রহিলেন শ্রীবাসের ঘরে
নিরন্তর বাল্য-ভাব, আন নাহি স্ফুরে
नित्यानन्द रहिलेन श्रीवासेर घरे
निरन्तर बाल्य-भाव, आन नाहि स्फुरे
 
 
अनुवाद
नित्यानंद श्रीवास पंडित के घर में ही निवास करते रहे। वे सदैव बालक की ही मनोदशा में रहते थे और कोई अन्य मनोदशा प्रकट नहीं करते थे।
 
Nityananda continued to live in Srivasa Pandit's house. He always remained in the mood of a child and never displayed any other mood.
तात्पर्य
श्री नित्यानंद प्रभु ने श्रीवास के घर में रहते हुए एक युवा बच्चे का स्वभाव प्रकट किया। श्रीवास की पत्नी मालिनी ने वाट्सल्य के भाव से उन्हें अपने पुत्र के समान भोजन कराया। इसलिए श्री नित्यानंद के प्रति श्रीवास के लगाव को जानने के लिए, श्री महाप्रभु ने उनसे कहा, "तुम्हें नित्यानंद के साथ ज्यादा नहीं मिलना चाहिए, जिनका चरित्र और पारिवारिक पृष्ठभूमि अज्ञात है।" इस पर, श्रीवास ने कहा, "मैं जानता हूं कि नित्यानंद आपका अपना शरीर है। भगवान के शरीर और आत्मा में कोई अंतर नहीं है, और यह वाट्सल्य-रस में हमारी सेवा से साबित हो रहा है। आपकी सेवा और नित्यानंद की सेवा में कोई अंतर नहीं है। मैं आपका भक्त हूं, और मैं जानता हूं कि जो कोई भी आपकी सेवा से जुड़ा हुआ है, वह भी मेरे दिल का पूजनीय भगवान है। इस तरह से विरोधाभासी बयानों के साथ मेरी परीक्षा लेना आपके लिए उचित नहीं है।" [यह भावार्थ पद 6-14 पर लागू होता है।]
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)