श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 313
 
 
श्लोक  2.8.313 
অচিন্ত্য-চৈতন্য-রঙ্গ বুঝন না যায
ক্ষণেকে ঐশ্বর্য করিঽ পুনঃ মূর্ছা পায
अचिन्त्य-चैतन्य-रङ्ग बुझन ना याय
क्षणेके ऐश्वर्य करिऽ पुनः मूर्छा पाय
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य की अकल्पनीय लीलाओं को कोई नहीं समझ सकता। एक क्षण वे अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करते, तो दूसरे ही क्षण अचेत हो जाते।
 
No one can comprehend the unimaginable pastimes of Lord Chaitanya. One moment He would display His majesty, and the next He would fall unconscious.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)