श्रीमद भागवत (10.81.3) में बताया गया है कि:अण्वाप्य उपाहृतं भक्तैःप्रेम्णा भूर्य एव मे भवेत्"मैं अपने भक्तों द्वारा शुद्ध प्रेम से दिया गया सबसे छोटा उपहार भी महान मानता हूं।"