श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 298
 
 
श्लोक  2.8.298 
অনন্ত ব্রহ্মাণ্ড আছে যাহার উদরে
তারে কি করিব এই ক্ষুদ্র উপহারে?”
अनन्त ब्रह्माण्ड आछे याहार उदरे
तारे कि करिब एइ क्षुद्र उपहारे?”
 
 
अनुवाद
"इन तुच्छ भेंटों से हम उनको कैसे संतुष्ट कर सकते हैं जिनके उदर में असंख्य ब्रह्माण्ड निवास करते हैं?"
 
"How can we satisfy Him in whose belly reside countless universes with these paltry offerings?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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