श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  2.8.232 
যতেক বৈষ্ণব-সব কীর্তন-আবেশে
না জানে আপন দেহ, অন্য জন কিসে
यतेक वैष्णव-सब कीर्तन-आवेशे
ना जाने आपन देह, अन्य जन किसे
 
 
अनुवाद
सभी वैष्णव कीर्तन के आनंद में इतने मग्न थे कि उन्हें अपने शरीर का भी ध्यान नहीं था, तो फिर उन्हें दूसरों का क्या पता?
 
All the Vaishnavas were so engrossed in the joy of Kirtan that they were not even aware of their own bodies, then how would they know about others?
तात्पर्य
कीर्तन-आवेशे ("कीर्तन के आनंद में") को पढ़ने का एक और तरीका है कीर्तनेर रसे या "कीर्तन के रसों में।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)