श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.8.22 
নিত্যানন্দ সমর্পিলুঙামি তোমাঽ স্থানে
সর্ব-মতে সম্বরণ করিবা আপনে”
नित्यानन्द समर्पिलुङामि तोमाऽ स्थाने
सर्व-मते सम्वरण करिबा आपने”
 
 
अनुवाद
"मैं नित्यानंद को आपको अर्पित कर रहा हूँ। कृपया उनका हर प्रकार से ध्यान रखें।"
 
"I am offering Nityananda to you. Please take care of him in every way."
तात्पर्य
"मैं तुम्हें अपने पूज्यनीय भगवान नित्यानंद भेंट करता हूँ, ताकि तुम निरंतर उनकी सेवा कर सको। तुम्हें हर मामले में लगातार उनकी सेवा में शामिल होना चाहिए। यही मेरा आशीर्वाद है।" श्रीवास के नेतृत्व में शुद्ध भक्तों द्वारा संधिनी शक्ति के प्रमुख देवता की भक्ति सेवा निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। श्री गौरासुंदर के चरित्र में, श्रीमन् महाप्रभु, जो राधा-गोविंद का संयुक्त रूप हैं, पाँच प्रकार के रसों के माध्यम से सेवा की जाती है। राधारानी की भावनाएँ श्री गौरासुंदर की ऊर्जाओं में प्रकट होती हैं, जैसे श्री गदाधर, श्री जगदानंद, और श्री स्वरूप दामोदर, माधुर्य-रस-लीला के तत्व के रूप में, या संयुग्मक चरित्र, लेकिन औदार्य-लीला, या उदार चरित्रों में संयुग्मक पात्रों की कल्पना करना दोष है जिसे रसाभास के रूप में जाना जाता है, पारलौकिक मेल का अतिव्यापन। श्रीवास जैसे भक्तों में वात्सल्य के साथ मिला हुआ दास्य-रस शुद्ध भक्ति सेवा का प्रधान उदाहरण है। यह नित्यानंद के अनुयायियों के लिए सबसे पोषित वस्तु है। श्री गदाधर के नेतृत्व में भगवान की ऊर्जाओं की पूजा श्री रूप गोस्वामी के अनुयायियों में पाई जाती है। प्रभु के भक्त काशीश्वर और गोविंद जैसे सहयोगियों को सहज दास्य के स्तर पर स्थित पाते हैं, श्री रामानंद और परमानंद को साख्य द्वारा कवर किए गए संयुग्मक लगाव की पूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं, और गौड़-मंडल, क्षेत्र-मंडल, और वृज-मंडल के निवासों को संत-रस के स्तर पर स्थित पाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)