श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 210-211
 
 
श्लोक  2.8.210-211 
শাস্ত্রের না জানিঽ মর্ম অধ্যাপনা করে
গর্দভের প্রায যেন শাস্ত্র বহিঽ মরে
এই-মত শাস্ত্র বহে, অর্থ নাহি জানে
অধম সভায অর্থ-অধম বাখানে
शास्त्रेर ना जानिऽ मर्म अध्यापना करे
गर्दभेर प्राय येन शास्त्र बहिऽ मरे
एइ-मत शास्त्र बहे, अर्थ नाहि जाने
अधम सभाय अर्थ-अधम वाखाने
 
 
अनुवाद
जो लोग शास्त्रों का अर्थ समझे बिना ही उन्हें पढ़ाते हैं, वे गधों की तरह शास्त्रों का बोझ ढो रहे हैं। इस तरह वे शास्त्रों का उद्देश्य समझे बिना ही उनका बोझ ढो रहे हैं। वे अविवेकी श्रोताओं के सामने अविवेकी अर्थ प्रस्तुत करते हैं।
 
Those who teach the scriptures without understanding their meaning are carrying the burden of the scriptures like donkeys. Thus, they are carrying the burden of the scriptures without understanding their purpose. They present unintelligible meanings to unintelligible listeners.
तात्पर्य
सभाया या "श्रोता" के एक अन्य अर्थ स्वभाव या "प्रकृति" है। श्रीमद्भगवतम के घमंडी अध्यापक जो अपना गर्व अधार्मिक निष्कर्ष प्रस्तुत करके दिखाते हैं, वे उन गधों की तरह हैं जो बिना शास्त्र संबंधी कथनों को समझे बस बोझ उठाते हैं। वे बेकार में ही श्रास्त्र पढ़ाने और अध्ययन करने में मेहनत करते हैं। श्रीमद्भगवतम के ऐसे पेशेवर अधार्मिक वक्ताओं द्वारा बिना योग्यता वाले श्रोताओं को दी जाने वाली व्याख्या पूरी तरह से घृणित होती है। पद्म पुराण (उत्तरा-खंड, अध्याय साठ) में कहा गया है।

"विप्रैर्भागवती वार्ता गेहे गेहे जने जने। कारिता धन-लोभेन, कथा-सारस्ततोगतः।"

"ब्राह्मण श्रीमद्भगवतम में कृष्ण के लीलाओं के विषयों का वर्णन घर-घर जाकर करेंगे, ताकि वे धन इकट्ठा कर सकें, इसलिए उनके श्रोता भक्ति सेवा प्राप्त नहीं करेंगे, जो ऐसे विषयों को सुनने का सार है।" मनु-संहिता (12.115) में कहा गया है।

"यम वदंति तमो-भूता, मूर्खाधर्मम तईवदाः। तत पापशतधाभूत्वा, तद्वक्तृननुगछति।"

"वे जो अज्ञानी हैं, अज्ञान के स्वरूप हैं, या धर्म को नहीं जानते हुए भी धार्मिक सिद्धांतों का उपदेश देते हैं, अपने श्रोताओं से सौ गुना अधिक पाप करते हैं।" मनु-संहिता (3.156) में भी कहा गया है।

"भृताक-अध्यापको यश च, भृताक-अध्यापितस्तथा। शूद्र-शिष्योगुरुश चैव, वाग दुष्टः कुंड-गोलकौ।"

"जो पढ़ाने के लिए शुल्क लेते हैं, जो पढ़ने के लिए शुल्क देते हैं, जो शूद्रों के शिष्य हैं, जो शूद्रों के अध्यात्मिक गुरु होते हैं, जो कठोर बोलते हैं, जो माताओं के अवैध पुत्र हैं जिनके वास्तविक पति अभी जीवित हैं, और जो माताओं के अवैध पुत्र हैं जिनके पति की मृत्यु हो चुकी है उन्हें श्राद्ध समारोहों या अन्य वैदिक अनुष्ठानों में भाग नहीं लेने देना चाहिए।" पद्म पुराण में कहा गया है।

"अवैष्णव-मुखोदगीर्णं पुताम हरि-कथामृतं। श्रवणं नैव करतव्यम, सर्पोच्छिष्टं यथा पयः।"

"किसी को भी ऐसे व्यक्ति से न तो भगवान के गुणों के बारे में सुनना चाहिए और न ही उससे सबक लेना चाहिए जो वैष्णव नहीं है। भले ही वह कृष्ण के बारे में बोले, ऐसा सबक स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह सर्प के होठों से छूए गए दूध के समान है।" ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है।

"शूद्राणां सूपकारी च, यो हरेरनाम-विक्रयी। विद्या-विक्रयी विप्रो, विषहीनो यथोरगः।"

"जो कृष्ण की भक्ति से रहित है, जो शूद्रों के लिए खाना बनाता है, जो पवित्र नामों का जाप करने में शिष्यों को दीक्षा देने के लिए पैसे लेता है, या जो वेतन के लिए शास्त्रों पर व्याख्यान देता है, वह बिना जहर वाले सांप के समान है।" श्रीमद्भगवतम (7.13.8) में कहा गया है।

"नशिष्यननूध्नीता, ग्रंथाननेवाभ्यसेद्बहून। न व्याख्यामुपयांजीत, नरंभानारभेत क्वचित।"

"एक सन्यासी को अधिक शिष्य जुटाने के लिए भौतिक लाभों का प्रलोभन नहीं देना चाहिए, और न ही उसे बिना जरूरत के कई किताबें पढ़नी चाहिए या अपनी आजीविका के साधन के रूप में प्रवचन देने चाहिए। उसे कभी भी अनावश्यक रूप से भौतिक संपन्नता बढ़ाने का प्रयास नहीं करना चाहिए।" चैतन्य-चरितामृत (मध्य 24.314) में भगवान शिव के निम्नलिखित प्राचीन कथन को उद्धृत किया गया है।

"अहं वेमि शुको वेत्ति, व्यासो वेत्ति न वेत्ति वा। भक्त्या भागवतं ग्राह्यं, न बुद्ध्या न च टीकया।"

"मैं जानता हूँगा; व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी जान सकते हैं; और व्यासदेव जान सकते हैं या नहीं भी जानते होंगे श्रीमद्भगवतम। कुल मिलाकर, श्रीमद्भगवतम, निष्कलंक पुराण, केवल भक्ति सेवा के माध्यम से ही सीखा जा सकता है, न कि भौतिक बुद्धि, अनुमानित तरीकों या काल्पनिक व्याख्याओं से।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)