श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.8.208 
হেন দাস্য-যোগ ছাডিঽ আর যেবা চায
অমৃত ছাডিযা যেন বিষ লাগিঽ ধায
हेन दास्य-योग छाडिऽ आर येबा चाय
अमृत छाडिया येन विष लागिऽ धाय
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति ऐसी सेवा को त्यागकर अन्य किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह उस व्यक्ति के समान है जो अमृत को त्यागकर विष की इच्छा करता है।
 
A person who abandons such service and desires something else is like a person who abandons nectar and desires poison.
तात्पर्य
गौरसुंदर के हाल के उदाहरण को देखने के बावजूद भक्ति मार्ग को त्याग देता है और गर्व से भगवान के समान ग्रह पर निवास करने वाले साॅलोक्य से शुरू होने वाले चार प्रकार के मुक्ति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो जाता है, वह इस तरह है जो अमृत को त्याग कर जहर पीता है। स्कंद पुराण में कहा गया है:

वासवदेव पर्यज्य् यों अन्यादेवम् उपासते

त्याक्त्वमृतं स मूढ़ात्मा भुँक्ते हलाहलं विषम्

"एक मूर्ख व्यक्ति जो वासुदेव की पूजा को छोड़ देता है और देवताओं की पूजा में संलग्न हो जाता है, वह जहर पीने के लिए अमृत को त्याग रहा है।" महाभारत में कहा गया है:

यस्तु विष्णुं पर्यज्य मोहद अन्यम् उपासते

स हेमा राजिम् उत्सृज्य पांशु राषिं जिघ्रक्षति

"एक व्यक्ति जो भ्रम से सर्वव्यापी भगवान विष्णु की पूजा को छोड़ देता है और अन्य देवताओं की पूजा करता है, वह राख के ढेर को स्वीकार करने के लिए सोने के ढेर को छोड़ देता है।" नारद-पंचरात्र (2.7.7) में आगे वर्णित है:

श्री हरि भक्त दास्यं च सर्वम् उक्तेः परं मुने

वैष्णवानाम् अभिमतम सारात सारं परात परम्

"भगवान हरि की भक्ति सेवा सबसे मनोरम है और सभी प्रकार के मुक्ति के श्रेष्ठ रूपों में से सर्वश्रेष्ठ है। हे महान ऋषि, यह सभी निष्कर्षों का सार है। यह वैष्णवों की राय है।" हरि-भक्ति-कल्प-लतिका में कहा गया है:

नास्ति दास्यात् परम श्रेयो नास्ति दास्यात् परं पदम्

नास्ति दास्यात् परो लाभो नास्ति दास्यात् परं सुखम्

"भगवान हरि की सेवा से अधिक शुभ कुछ नहीं है। भगवान हरि की सेवा से बेहतर कोई स्थिति नहीं है। भगवान हरि की सेवा से प्राप्त करने के लिए कुछ भी बेहतर नहीं है। भगवान हरि की सेवा से बड़ी कोई खुशी नहीं है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)