श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.8.190 
এ কোন্ অদ্ভুত—যাঽর সেবকের নৃত্য
সর্ব-বিঘ্ন নাশ হয, জগত্ পবিত্র
ए कोन् अद्भुत—याऽर सेवकेर नृत्य
सर्व-विघ्न नाश हय, जगत् पवित्र
 
 
अनुवाद
यह इतना अद्भुत नहीं था, क्योंकि भगवान के सेवकों के नृत्य से ही सारी बाधाएं नष्ट हो जाती हैं और सारा संसार पवित्र हो जाता है।
 
This was not so wonderful, because by the dance of the servants of God all obstacles are destroyed and the whole world is purified.
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (11.14.24) में कहा गया है:

वाग गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं

रुदत्यभिक्ष्णं हसति क्वचिच्च

विलाज्ज उद्गाति नृत्यते च

मद्-भक्ति-युक्तो भुवनं पवनाति

“जिस भक्त के शब्द कभी-कभी अटक जाते हैं, जिसका हृदय पिघल जाता है, जो लगातार रोता है और कभी-कभी हँसता है, जो शर्मिंदा महसूस करता है और जोर से रोता है और फिर नृत्य करता है - मेरी प्रेमपूर्ण सेवा में ऐसा निश्चित भक्त पूरे ब्रह्मांड को पवित्र करता है।” नारद पंचरात्र में कहा गया है:

संकर्तन-ध्वनिं श्रुत्वा

ये च नृत्यंति वैष्णवाः तेषां

पाद-राज-स्पर्शात

सद्य पूता वसुन्धरा

"माता पृथ्वी उन वैष्णवों के चरणों की धूल के स्पर्श से तुरंत पवित्र हो जाती है जो संकीर्तन की ध्वनि पर नृत्य करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)