वाग गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभिक्ष्णं हसति क्वचिच्च
विलाज्ज उद्गाति नृत्यते च
मद्-भक्ति-युक्तो भुवनं पवनाति
“जिस भक्त के शब्द कभी-कभी अटक जाते हैं, जिसका हृदय पिघल जाता है, जो लगातार रोता है और कभी-कभी हँसता है, जो शर्मिंदा महसूस करता है और जोर से रोता है और फिर नृत्य करता है - मेरी प्रेमपूर्ण सेवा में ऐसा निश्चित भक्त पूरे ब्रह्मांड को पवित्र करता है।” नारद पंचरात्र में कहा गया है:
संकर्तन-ध्वनिं श्रुत्वा
ये च नृत्यंति वैष्णवाः तेषां
पाद-राज-स्पर्शात
सद्य पूता वसुन्धरा
"माता पृथ्वी उन वैष्णवों के चरणों की धूल के स्पर्श से तुरंत पवित्र हो जाती है जो संकीर्तन की ध्वनि पर नृत्य करते हैं।"
