श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  2.8.178 
বাহ্য পাইঽ দাস্য-ভাবে করযে ক্রন্দন
দন্তে তৃণ করিঽ চাহে চরণ-সেবন
बाह्य पाइऽ दास्य-भावे करये क्रन्दन
दन्ते तृण करिऽ चाहे चरण-सेवन
 
 
अनुवाद
जब उन्हें चेतना वापस आती, तो वे सेवक की तरह रोने लगते, दाँतों में तिनका दबाकर भगवान के चरणकमलों की सेवा की याचना करते।
 
When he regained consciousness, he would cry like a servant, clutching a straw in his teeth and begging to serve the Lord's lotus feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)