श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 176
 
 
श्लोक  2.8.176 
ক্ষণে ক্ষণে হয ভাব—ত্রিভঙ্গ-সুন্দর
প্রহরেক সেই-মত থাকে বিশ্বম্ভর
क्षणे क्षणे हय भाव—त्रिभङ्ग-सुन्दर
प्रहरेक सेइ-मत थाके विश्वम्भर
 
 
अनुवाद
कभी-कभी विश्वम्भर कृष्ण के मनोहर त्रिविध रूप में लीन हो जाते थे। वे तीन घंटे तक उसी अवस्था में रहते थे।
 
Sometimes Visvambhara would become absorbed in the beautiful threefold form of Krishna. He would remain in that state for up to three hours.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)