श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 159
 
 
श्लोक  2.8.159 
কখন বা হয অঙ্গ জ্বলন্ত অনল
দিতে মাত্র মলযজ শুখায সকল
कखन वा हय अङ्ग ज्वलन्त अनल
दिते मात्र मलयज शुखाय सकल
 
 
अनुवाद
कभी-कभी उनका शरीर प्रज्वलित अग्नि के समान गर्म हो जाता था और जब उनके शरीर पर चंदन का लेप किया जाता था तो वह तुरन्त सूख जाता था।
 
Sometimes his body would become as hot as a blazing fire and when sandalwood paste was applied on his body it would dry up immediately.
तात्पर्य
कभी-कभी उनके शरीर की गर्मी भड़कती आग के समान हो जाती थी, क्यों कि जैसे ही उनके शरीर पर चन्दन का लेप किया जाता, वह सूख जाता था।

मलयज शब्द मलय पर्वत से लाये गए चंदन के लिए है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)