श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  2.8.153 
ক্ষণে ক্ষণে হয অঙ্গ ব্রহ্মাণ্ডের ভর
ধরিতে সমর্থ কেহ নহে অনুচর
क्षणे क्षणे हय अङ्ग ब्रह्माण्डेर भर
धरिते समर्थ केह नहे अनुचर
 
 
अनुवाद
कभी-कभी उनका शरीर ब्रह्माण्ड जितना भारी हो जाता था, तब उनका कोई भी अनुयायी उन्हें स्थिर नहीं रख पाता था।
 
Sometimes his body became as heavy as the universe, then none of his followers could keep him steady.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)