श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  2.8.15-16 
মদিরা-যবনী যদি নিত্যানন্দ ধরে
জাতি-প্রাণ-ধন যদি মোর নাশ করে
তথাপি মোহার চিত্তে নহিব অন্যথা
সত্য সত্য তোমারে কহিলুঙ্ এই কথা”
मदिरा-यवनी यदि नित्यानन्द धरे
जाति-प्राण-धन यदि मोर नाश करे
तथापि मोहार चित्ते नहिब अन्यथा
सत्य सत्य तोमारे कहिलुङ् एइ कथा”
 
 
अनुवाद
"यदि नित्यानंद मदिरा का घड़ा भी धारण करे, स्त्रियों के साथ संगति करे, मेरी जाति, जीवन और धन को नष्ट करे, तो भी मेरा विश्वास नहीं डगमगाएगा। यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ।"
 
"Even if Nityananda were to carry a pot of wine, associate with women, destroy my caste, life and wealth, my faith would not waver. I am telling you this truth."
तात्पर्य
शराब के नषे में रहने वाले लोग अनेक पाप कर्मों को करते हैं, जिससे सभ्य मनुष्यों की दृष्टि में अति घृणित होते हैं। शराब पीने से जीव की बुद्धि मलिन होती है तथा उसकी पाप प्रवृत्ति बढ़ जाती है। स्त्री रूप के विवर में आकर्षित होने वाले सांसरिक इन्द्रिय भोगी प्रायः स्त्री जाति के साथ बिना जाति और व्यवहार को सोचे बूझे, अनियंत्रित सेवन करते हैं। इससे अपने वंश और कुल का अपमान करके स्वयं भी अधम बनते हैं। प्राजापत्य (निर्धारित) व ब्राह्म (ब्राह्मण से उत्पन्न) के अतिरिक्त पिशाच (भूत) व राक्षस (दानव) जैसे विवाह तथा सवर्ण (एक जाति के) के अतिरिक्त असवर्ण (अंतरजातीय) व अपकृति (अति निम्नवर्गीय) जैसे विवाह, अपने वंश को नीचा बनाते हैं। शराब पीकर मनुष्य की बुद्धि पापमय मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाती है जिससे स्त्रियों के संग के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। सामाजिक भावनानुसार भी यह अति घृणित है। श्री नित्यानंद दोष से रहित उन स्वभाव वालों के भी प्राणप्रिय हैं। यदि जगद्गुरु अवधूत श्री नित्यानंद ऐसे निंदित कर्म में कभी प्रवृत्त भी हो जाएं, तब भी श्रीवास की श्री नित्यानंद के लिए आसक्ति कम नहीं हो सकती। श्रीवास कह रहे हैं कि यदि श्री नित्यानंद प्रभु मेरे जाति को बिगाड़ें, मेरी हत्या करें, मेरे धन का अपहरण करें, आदि; तब भी श्री नित्यानंद की सेवा करने की मेरी प्रवृत्ति तनिक भी क्षीण नहीं होगी। प्रेम का स्वरूप ऐसा ही है कि प्रेमी को अगर प्रेम के पात्र में कुछ साधारण रूप से देखने में घृणित बातें पाई जाएं तो कुछ फर्क नहीं पड़ता है। " मैं तो श्री नित्यानंद प्रभु का अनादि सम्बन्धी हूँ। मैं अगर कभी भी उनमें कुछ क्षणिक सांसारिक विरूद्ध भाव देखूँ तो भी अपनी आसक्ति की ओर से विशेषता नहीं छोड़ूँगा। वास्तव में श्री नित्यानंद प्रभु महामनीषी के आदर्श रूप हैं। यदि jemand नित्यानंद को नीचा दिखाना चाहता हो और श्री नित्यानंद को इस संसार के घृणित कर्म में आरोपित करने का प्रयत्न करे तो मेरे मत से मुझे उनकी चिर आनंदमयी सेवा छोड़ने की आवश्यकता नहीं समझनी चाहिए। " निर्बल हृदय और पापी जीव नित्यानंद के गुणगान के इन विषयों को समझ नहीं पाते हैं, इसलिए वे उसकी गौरव गाथा को स्वीकार करके अपने ही पाप स्वभाव का समर्थन करते हैं। इससे उनके घृणित और अनीतिक रुचियों का पता लग जाता है। श्री श्रीमन नित्यानंद प्रभु के गंभीर पराभाविक लीला में कट्टरता और परम तत्व को हानि पहुँचाने वाली वृत्तियाँ कभी प्रवेश नहीं कर सकती हैं। श्री भगवान कृष्ण पापियों की बुद्धि को भ्रष्ट करने के लिए लुच्चे होने के लीला करते हैं। ऐसे लीला से निम्न रुचि वाले लोगों के लिए अति अशुभ होता है। जीवों की आनंदमयी सेवा प्रवृत्ति, भगवान के द्वारा प्रदर्शित की गई सेवा कार्य में लिप्त होने वाले और भौतिक भोग से रहित लोगों की श्रेष्ठता दिखाने वाले नित्य लीला से जाग्रत होती है। कृष्णदास कविराज प्रभु के भाई का श्री चैतन्यदेव के लिए सामान्य आसक्ति थी, परंतु वे श्री नित्यानंद के दैवी प्रेम को समझने में असमर्थ रहे और इसीसे उनका विनाश हुआ। उन्हीं के पदचिह्न पर चलते हुए बाउल, प्राकृत सहजिया और अन्य अप-सम्प्रदाय नरक गमन में तत्पर हो रहे हैं। उनकी भी यही प्रवृत्ति होती है कि श्री नित्यानंद प्रभु में निंदित गुणों का आरोप करें। श्री नित्यानंद प्रभु कभी भी नैतिकता विरुद्ध कार्य करने के लिए उत्सुक नहीं हुए। जो दुर्दैवी जन उन पर अपनी दानवी नीतियों के द्वारा ऐसे भाव का आरोप करते हैं, उनके संग का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए और सब प्रकार से श्री नित्यानंद के चरणों में समर्पित जनों के पदचिह्नों पर चलना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)