श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.8.130 
যদ্যপিহ পরানন্দে তাঙ্র নাহি দুঃখ
তথাপিহ না জানিলে মোর বড সুখ”
यद्यपिह परानन्दे ताङ्र नाहि दुःख
तथापिह ना जानिले मोर बड सुख”
 
 
अनुवाद
"यद्यपि आध्यात्मिक आनंद के कारण उन्हें कोई कष्ट नहीं होता, फिर भी मुझे इससे अनभिज्ञ रहकर प्रसन्नता होगी।"
 
"Though spiritual bliss causes them no pain, I would still be happy to remain ignorant of it."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)