श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  2.8.118 
প্রভুর হুঙ্কার, আর নিশা-হরি-ধ্বনি
ব্রহ্মাণ্ড ভেদযে যেন হেন-মত শুনি
प्रभुर हुङ्कार, आर निशा-हरि-ध्वनि
ब्रह्माण्ड भेदये येन हेन-मत शुनि
 
 
अनुवाद
भगवान की गर्जना और हरि नाम के कोलाहलपूर्ण कीर्तन ने ब्रह्माण्ड के आवरण को छिन्न-भिन्न कर दिया।
 
The roar of the Lord and the noisy chanting of Hari's name shattered the veil of the universe.
तात्पर्य
रात और दिन, संसार के लोग संवेद सुखों में लिप्त रहते हैं, और सो जाते हैं। लेकिन जो भक्त श्री हरि की शरण में हैं वे दिन के कार्यकलापों के साथ ही रात में भी हरि नामों का जाप करते हैं, सोने के बजाय।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)