श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.8.107 
আজি হৈতে নিরবন্ধিত করহ সকল
নিশায করিব সবে কীর্তন-মঙ্গল
आजि हैते निरबन्धित करह सकल
निशाय करिब सबे कीर्तन-मङ्गल
 
 
अनुवाद
“संकल्प करो कि आज से हम रात्रि में सामूहिक रूप से पवित्र नामों का जप करेंगे।
 
“Resolve that from today onwards we will chant the holy names collectively at night.
तात्पर्य
निर्बन्धिता शब्द का अर्थ है " दृढ़ संकल्प " । " आप सभी लोग दृढ़ निश्चय करें कि आज से प्रतिदिन रात्रि में हम कीर्तन का मंगलमय उत्सव करेंगे । " ऐसा संकल्प लिया गया कि प्रत्येक रात्रि में बिना किसी चूक के, छत्तीस अक्षरों वाले सोलह पवित्र नामों का उच्चारण करेंगे
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)