श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 8: भगवान की आभूषण का प्रकटन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.8.10 
পণ্ডিতেরে পরীক্ষযে প্রভু বিশ্বম্ভর
“এই অবধূতে কেনে রাখ নিরন্তর?
पण्डितेरे परीक्षये प्रभु विश्वम्भर
“एइ अवधूते केने राख निरन्तर?
 
 
अनुवाद
श्रीवास की परीक्षा लेने के लिए भगवान विश्वम्भर ने कहा, "आप इस अवधूत को अपने घर में क्यों रख रहे हैं?
 
To test Srivasa, Lord Visvambhara said, “Why are you keeping this Avadhuta in your house?
तात्पर्य
श्री वल्लभाचार्य अवधूत की परिभाषा देते हैं, "एक ऐसा व्यक्ति जो शरीर की इच्छाओं से पूरी तरह रहित है और मृत पदार्थ जैसा प्रतीत होता है।" सिद्धांत-प्रदीप के अनुसार, "अवधूत वह है जो अपने पेट और जननांगों से पहचान के गर्व से पूरी तरह अलग है।" शब्द-सार कहता है: "एक योगी जो सख्त ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का पालन करता है, जो वर्ण के सिद्धांतों से अलग है, और जो हमेशा परमात्मा पर चिंतन करने में लगा रहता है, उसे अवधूत कहा जाता है। अक्षर का अर्थ है अक्षर, या 'अपरिहार्य;' अक्षर वा का अर्थ है वरण्य, या 'आदरणीय;' अक्षर तू का अर्थ है 'भौतिक बंधन से मुक्त;' और अक्षर ता का तात्पर्य प्रसिद्ध वैदिक कथन तत त्वम असि-'तू वही है' के ज्ञाता से है। इसलिए जिस में ये गुण हैं वह अवधूत है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)