श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.7.99 
আজি আমি এডাইনু পরম সঙ্কটে
সেহো যে কারণ তুমি আছিলা নিকটে
आजि आमि एडाइनु परम सङ्कटे
सेहो ये कारण तुमि आछिला निकटे
 
 
अनुवाद
“मैं एक बड़े खतरे से बच सका क्योंकि तुम मेरे साथ थे।
 
“I was able to escape a great danger because you were with me.
तात्पर्य
मुकुंद ने गदाधर पंडित को पुंडरीक विद्यानियाधि के भक्तिमय भाव को देखने का अवसर दिया और एक सामान्य मनुष्य के रूप में एक महान वैष्णव पुंडरीक को देखने के वैष्णव-अपराध से होने वाले ख़तरे को नष्ट कर दिया, जबकि गदाधर पंडित भ्रम के अपने व्यतिक्रम में विद्यानियाधि को एक स्थूल भौतिकवादी के समान स्तर पर देखने के बहाने थे। गदाधर पंडित ने मुकुंद के पाठ के लिए आभार व्यक्त करते हुए यह कथन बोला।

यदि भौतिकवादी वैष्णवों की गतिविधियों और व्यवहार को नहीं समझ सकते हैं, तो वे हर पल गलतियाँ करेंगे और वैष्णवों के खिलाफ अपराधों के ढेर लगा देंगे। लेकिन यदि वे पर्याप्त रूप से धार्मिक हैं, तो वे वैष्णव-अपराध नहीं करेंगे और इस तरह गुमराह नहीं होंगे। कोई भी युक्त-वैराग्य या उचित वैराग्य के परिणाम को फलु-वैराग्य या झूठे वैराग्य के माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकता है; बल्कि, कोई उचित दृष्टि की कमी के परिणामस्वरूप होने वाले अपराधों को ही जमा करता है। चूँकि श्री चैतन्य के आश्रय में भक्त युक्त-वैराग्य और फलु-वैराग्य के बीच के अंतर को समझते हैं, इसलिए वे इस दुनिया के सामान्य, मूर्ख, लालची लोगों से सभी मामलों में श्रेष्ठ हैं। केवल वे ही पूरी दुनिया के आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य करने में सक्षम हैं। भौतिक दृष्टि वाले व्यक्ति जो श्री चैतन्यदेव के अधीन नहीं हैं, वे अपनी मूर्खता की महिमा करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)